बलबन कौन था ?

बलबन कौन था ?

  • गयासुद्दीन बलबन (Ghiyasuddin Balban) दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश का शासक था। बलबन का शासनकाल 1265 ई. से 1286 ई. तक माना जाता है। गयासुद्दीन बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था। यद्यपि वह इल्बारी तुर्क था।
  • बलबन दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश का एक गुलाम था।
  • गयासुद्दीन बलबन ने 20 वर्ष तक वजीर की हैसियत से तथा 20 वर्ष तक सुल्तान के रूप में शासन किया।
  • बलबन (Balban) ने द्वितीय इल्बारी वंश की स्थापना की।
  • 1233 ई. में ग्वालियर विजय के पश्चात् इल्तुतमिश ने दिल्ली में बलबन को खरीदा था।
  • बलबन दिल्ली सल्तनत का एक ऐसा व्यक्ति था, जो सुल्तान न होते हुए भी सुल्तान के छत्र का उपयोग करता था। वह पहला शासक था। जिसने सुल्तान के पद और अधिकारों के बारे में विस्तृत रूप से विचार प्रकट किये।
  • उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए ’रक्त एवं लौह की नीति’ अपनाई।
  • बलबन के राजत्व की पूरी जानकारी इतिहासकार बरनी द्वारा संकलित उसके वसया में मिलता है।
  • बलबन के राजत्व सिद्धान्त की दो मुख्य विशेषताएं थीं –
    (1) सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ होता है।
    (2) सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है।
  • उसके अनुसार ’सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है और उसका स्थान केवल पैगम्बर के पश्चात् है।’
  • बलबन अपने को ’फिरदौसी के शाहनामा’ में वर्णित ’अफरासियाब वंशज’ तथा शासन को ईरानी आदर्श के रूप में सुव्यवस्थित किया।
  • उसने फारसी पद्धति पर अपने दरबार का गठन किया।
  • बलबन ने उन सभी जागीरों की जाँच कराई, जो विभिन्न व्यक्तियों को सैनिक सेवा के बदले शासकों द्वारा दी जाती थीं।
  • जागीरों से आय एकत्र करने का अधिकार सरकारी कर्मचारियों को दिया गया और जागीरदारों को नकद धन देने के लिए आदेश दिये गये किन्तु सैनिकों को वेतन के स्थान पर पहले की भाँति भूमि प्राप्त होती रही।
  • उसके समय में वजीर के पद का महत्त्व घट गया और नाइब जैसा कोई अधिकारी न रहा अर्थात् नाइब के पद को खत्म कर दिया गया।
  • उसने ऐसे सैनिकों को जो सेवा के योग्य नहीं रह गये थे, पेंशन देकर सेवा मुक्त किया।
  • बलबन ने ’चालीसा दल’ का दमन किया।
  • सर्वप्रथम बलबन ने ही सदैव तत्पर सेना रखने की शुरूआत की थी। बलबन के शासन की सफलता का मुख्य श्रेय उसका गुप्तचर विभाग (बरीद-ए-मुमालिक) था।
  • गुप्तचर विभाग की स्थापना सामन्तों की गतिविधियों पर निगरानी हेतु की गई थी।
  • मंगोलों का मुकाबला करने के लिए उसने एक अन्य विभाग ’दीवाने अर्ज’ की स्थापना की।
  • उसने इमादुल मुल्क को सेनामंत्री (दीवान-ए-आरिज) नियुक्त किया तथा उसे ’रावत-ए-अर्ज’ की उपाधि दी।
  • उसने सिजदा (घुटने पर बैठकर सिर झुकाना) और पाबोस (सुल्तान के चरण का चुंबन करना) की प्रथा को अपने दरबार में शुरू करवाया, जो मूलतः ईरानी प्रथा थी और जिन्हें गैर इस्लामी समझा जाता था। इसके अतिरिक्त उसने दरबार में प्रत्येक वर्ष ईरानी त्योहार नौरोज प्रथा भी आरम्भ की थी।
  • बलबन ने इक्तादारों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए ख्वाजा नामक एक अधिकारी की नियुक्ति की थी।
  • उसने सेना को नकद वेतन देने की व्यवस्था की।

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